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Thursday, October 14, 2010

राजनेताओं का मुस्लिम अल्पसंख्यक प्रेम

बिहार विधान सभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है! सभी पार्टियां चुनावी दंगल मे कूदने के लिये कमर कस चुकी है! जहाँ एक तरफ पन्द्रह साल राज कर चुके लालू यादव…. राम विलास पासवान के साथ गठबन्धन की नाव पर सवार हो कर चुनावी बैतरणी पार कर के बिहार की सत्ता पर काबिज़ होने की योजना बना रहें है! वही नीतीश कुमार अपने किये गये विकास कार्यो के बल पर अपनी जीत के दावे कर रहे है.... वही बात अगर कांग्रेस की जाये तो पार्टी अकेले आगे बढ़ने की नीति पर चल रही है। वजह भी साफ है ......जी हाँ, इसकी वजह है राहुल गाँधी का चुनाव अभियान अपने हाथ मे लेना ...कुल मिला कर देखा जाये तो लड़ाई दिलचस्प होने के पूरे आसार दिख रहे है। लेकिन अगर हम मेन मुकाबले की बात करे... तो वो है लालू राबडी के 15 साल बनाम नितीश कुमार के 5 साल ......ये तो बात हुई सियासी दलो की....लेकिन अब हम बात करने जा रहे है उस जनता की.... जिससे हर चुनाव से पहले किये जाते है बडे़ बडे़ वादे... और जैसे ही चुनाव खत्म होता है.... साथ ही खत्म हो जाते है सारे वादे........ इस पूरी कवायद मे सबसे ज्यादा अगर अपने आप को ठगा सा महसूस करता है.... तो वो है बिहार का अल्पसंख्यक मुस्लिम मतदाता...। चुनाव आते ही राजनीति की मन्डी मे अल्पसंख्यक नेताओ को लगभग सभी पार्टिया हाईलाइट कर रही है। सब अपने को मुसलमानो का सबसे हितैषी साबित करने मे लगे है। इस कवायद मे कांग्रेस ने जहां महबूब अली कैसर को बिहार प्रदेश की कमान सौपी..... वही नीतीश कुमार ने आलोचनाओ की परवाह किये बगैर भाजपा के धुरविरोधी छवि वाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन को अपने खे़मे मे शामिल कर अल्पसंख्यक मतदाताओ को रिझाने का पूरी तैयारी कर ली..... ऐसे मे आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव कैसे पीछे रह सकते है। उन्होने ने भी जेडीयू के पूर्व विधायक रियाजुल हक को गाजे बाजे के साथ अपनी पार्टी मे शामिल कर लिया... लेकिन ऐसे मे बिहार की जनता…. बिहार की कमानकिसको सौंपती है??? ये तो वक्त ही बतायेगा लेकिन सवाल ये उठता है... कि क्या सियासी दलो का ये मुस्लिम प्रेम चुनाव के साथ ही ख़त्म हो जाएगा या फ़िर क़ायम रहेगा???

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